अशोकनगर (मध्य प्रदेश):
कभी अपनी बेहतरीन बलुआ पत्थर की नक्काशी के लिए प्रसिद्ध कदवाया गांव आज एक गंभीर मानवीय त्रासदी का प्रतीक बन चुका है। यहां की कला, जो कभी पहचान और गर्व का कारण थी, अब लोगों की जिंदगी छीन रही है।
गांव में पत्थर की नक्काशी के दौरान निकलने वाली सिलिका धूल ने सैकड़ों परिवारों को तबाह कर दिया है। यह महीन धूल मजदूरों के फेफड़ों में जाकर जमा हो जाती है और धीरे-धीरे उन्हें सिलिकोसिस जैसी लाइलाज बीमारी का शिकार बना देती है।
विधवाओं का बढ़ता गांव
कदवाया में हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि कई घरों में कमाने वाले पुरुष अब नहीं रहे। महिलाओं के पति इस बीमारी के कारण असमय मौत का शिकार हो चुके हैं, जिससे गांव में विधवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।
बिना सुरक्षा के काम
स्थानीय मजदूरों का कहना है कि वे वर्षों से बिना किसी सुरक्षा उपकरण के इस खतरनाक काम को करने को मजबूर हैं। न मास्क, न कोई अन्य बचाव—सिर्फ रोजी-रोटी की मजबूरी।
स्वास्थ्य सेवाओं की कमी
गांव में न तो नियमित स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था है और न ही इस बीमारी के प्रति पर्याप्त जागरूकता। कई लोग तब तक इलाज नहीं करवाते जब तक बीमारी गंभीर रूप न ले ले।
सरकारी मदद की दरकार
ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि उन्हें उचित इलाज, मुआवजा और वैकल्पिक रोजगार के अवसर दिए जाएं। साथ ही, काम के दौरान सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाएं ताकि आगे और जानें न जाएं।
निष्कर्ष
कदवाया की यह कहानी केवल एक गांव की नहीं, बल्कि उन अनगिनत मजदूरों की हकीकत है जो अपने परिवार के लिए रोज मौत के साए में काम करते हैं। जरूरत है कि इस ‘सफेद मौत’ के खिलाफ तुरंत और ठोस कदम उठाए जाएं।