रायपुर/छत्तीसगढ़।
ग्रामीण इलाकों में तालाबों की संख्या में एक का इजाफा भी बड़ी खबर मानी जाती है। यह केवल एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि पूरे गांव की समृद्धि, सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य की संभावनाओं से जुड़ा होता है। अब छत्तीसगढ़ में इसी सोच की वापसी देखने को मिल रही है, जहां जल संरक्षण को लेकर गांव-गांव में नई पहल तेज हुई है।
राज्य में “मोर गांव–मोर पानी” अभियान के तहत परंपरागत जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करने और नई संरचनाएं बनाने का काम तेजी से चल रहा है। मनरेगा के माध्यम से आजीविका डबरियों और ‘नवा तरिया’ का निर्माण किया जा रहा है। अब तक करीब 12,000 आजीविका डबरियां बनाई जा चुकी हैं, जिनमें बड़ी संख्या अनुसूचित जाति, जनजाति और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) परिवारों की निजी भूमि पर हैं। इसके साथ ही लगभग 500 ‘नवा तरिया’ सामुदायिक स्तर पर बनाए जा रहे हैं या निर्माणाधीन हैं।
इन जल संरचनाओं का असर अब जमीन पर साफ दिखने लगा है। जिन खेतों में पहले पानी नहीं रुकता था, वहां अब पानी ठहरने लगा है। कई जगहों पर सूख चुके कुएं फिर से भरने लगे हैं। सिंचाई का दायरा बढ़ने से किसान दूसरी और तीसरी फसल लेने लगे हैं, वहीं मछली पालन जैसे अतिरिक्त आय के स्रोत भी विकसित हो रहे हैं।
इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू स्थानीय भागीदारी है। गांव के लोग खुद तय कर रहे हैं कि कहां तालाब या डबरी बनेगी। निर्माण कार्यों में महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी भी देखने को मिल रही है, जिससे यह अभियान केवल सरकारी योजना न रहकर सामुदायिक आंदोलन का रूप लेता जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में पहले “छः कोरी छः आगर” यानी जरूरत से कहीं अधिक जल संरचनाएं होने की परंपरा रही है, जो पानी की प्रचुरता और निश्चिंतता का प्रतीक थी। हालांकि बीच के वर्षों में यह परंपरा कमजोर पड़ी, लेकिन अब फिर से उसी दिशा में प्रयास शुरू हो गए हैं।
जल संरक्षण के इन प्रयासों ने न केवल ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराया है, बल्कि स्थायी आजीविका के नए रास्ते भी खोले हैं। धीरे-धीरे यह स्पष्ट हो रहा है कि यदि पानी गांव में रुकेगा, तो समृद्धि भी वहीं टिकेगी।